जीवन अनगिनत श्याह प्रतिबिम्बों से आंख मिचैली के साथ अनवरत गतिमान है। मन का क्रम भ्रम के भवर में घिर अधीर हो ठहर जाता किन्तु समय सतत गतिमान है।इसी धीर अधीर मन को नए उत्साह से लबरेज कर पुनः उत्साहः के नव प्रकाश भविष्य के राह आलोकित हो जिससे हर्ष दीप प्रज्वलित रहे त्योहारो की श्रृंखला को सम्भवतः जीवन दर्शन में समाहित किया है। दीपोत्सव में दैदीप्यमान अनगिनत प्रकाश बिम्बों की श्रंखला भविष्य के गर्त में छिपे तम को परास्त कर ऐसे उदित संसार का शृजन कर सके जहाँ हर किसी को उसके भाग खुशियो की लड़िया फुलझड़ी की भांति खिलखिला सके। फटाकों की प्रतिध्वनित आवाज कानो को ही न गुंजित कर दिल के तार को भी झंकृत कर सके जिससे जीवन संगीत में सतत नए धुन का प्रवाह हर पल खुशियो के लय ताल से तरंगित हो सके। आपके कुछ दीप उन नामो को भी समर्पित हो जिनसे प्रत्यक्ष या परोक्ष भाव कही न कही हमारे खुशियों के कारणों के कारक हो। भावो के प्रकाश हर किसी को उसके हिस्से का अलोक दे ऐसे दीप के अलख ज्योति से चहुँ दिशा दैदिप्तमान हो। आप सभी को दीपावली के पर्व की हार्दिक शुभकामना।
सुख कि दुनिया मन के बाहर नहीं मन के अंदर है , इसलिए वो मनसुख है। एक किंचित प्रयास, चेहरे पर कब्जे कि ताक में बैठे तनाव कि रेखा को हतोत्साहित कर मन को गुदगुदाने का, जिसका दर्प चेहरे पर उभर आये.......
Subscribe to:
Post Comments (Atom)
आदिपुरुष...!!
मैं इसके इंतजार में था की फ़िल्म रिलीन हो और देखे। सप्ताहांत में मौका भी था। सामान्यतः फ़िल्म की समीक्षा फ़िल्म देखने से पहले न देखता हूँ और न...
-
सब कुछ यथावत रहते हुए भी , खुश होने के कारण तलाश करते रहे। बेशक आप इस बात से वाकिफ है कि कैलेंडर पर सिर्फ वर्ष नए अंकित ...
-
मनसुख अघाया-अघाया से दालान के बाहर सुख रहे पुवाल पर लेटा है। सुबह के काम से फारिग हो रखा है। हाथ मे कोई अखबार का पन्ना है। मन...
-
बहुत दिनों बाद आज मनसुख खुश नजर आ रहा था। शाम को सब काम निपटाकर वही आँगन में एक किनारे नीच...
No comments:
Post a Comment