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Tuesday, 25 October 2016

ग्रेट महाभारत शो

                         
                    मनसुख के हाथ में अखबार का आधा भाग पड़ा था। मनसुख कुछ गौर से उसमे पढ़ने की कोशिस  कर रह था।  तब तक बगल में बैल के नाद में चारा मिलाते -मिलाते काका ने मनसुख से कहा - का रे जब पढ़े के रहे तो खेत में भगता था अब का ओ हे में पढ़ने की कोशिस कर रहा है। मनसुख को पता है कोई काम न भी हो तो काका बिना टोके रुकने वाले कहाँ है। मनसुख बोला न काका पढ़िए लेते तो का हो जाता। ई सब तो पढ़ले लिखल है जकरा हम रोज केहू न केहू बहाने कोसते रहते है। सबके नजर में तो सारे दिक्कत के जड़ तो यही पढ़ल लिखल बाबू सब है। का बात है मनसुख आज तो बड़ा बुद्धिमानी वाला गप्प हांक रहा है है -काका बोले। 
मनसुख -का काका हमारे बुद्धि पर कोनो शक है का। 
काका -नै रे फिर भी ई तो बता का लिखल है ई फाटल अखबार में। 
मनसुख -न काका हमको ई नहीं समझ आ रहा की परिवार में सब देश के लिए लड़ रहा, देखो देश सेवा के लिए सब कितना मेहनत कर रहे है। और ई अखबार वाले इनको कोस रहे है।  बेटा तो सब बात मानने के लिए तैयार है लेकिन बाबूजी है की मानते नहीं। ई तो काका महाभारत से भी ज्यादा गांठ वाला परिवार लग रहा है। थोड़ा कलियुग है इसलिए लगता है कहानी कुछ उलट सा गया है। यहाँ पता नहीं धृतराष्ट को किससे मोह है देश से की बेटा से की भाई से । काका अब तक तो ध्यान से सुनकर समझने की कोशिस कर रहे थे किन्तु कुछ पल्ले नहीं पड़ने से झुलाकर बोले -अरे का बात लिखा है साफ़ साफ़ बता। हम कोनो कहानी नहीं पूछ रहे। 
मनसुख -हाँ काका ओहि तो बता रहे है। अब तो समाचार भी कहानी जैसे ही हो गया है। अब काका बात ई है की हमको भी ठीक से कुछ समझ में नहीं आ रहा है। पहले तो ई महाभारत जैसा लग रहा था किन्तु भाई-भाई का प्यार देख लगने लगा की रामायण है। अब काका ई दोनु का मिक्स कहानी है। काका मनसुख को समझने की कोशिस में लग रहे है। 
मनसुख आगे बोला -अब काका बात अइसन है की बात तो बस राजगद्दी के ही है जैसे की रामायण और महाभारत में था। किन्तु यहाँ अब पुत्र प्रेम किसी कारण से शायद कलयुग का प्रभाव है मित्र प्रेम में ज्यादा बदल गया है। इस कहानी में तो सब भगवान ही छाये है। कही रामजी है तो कही शिवजी,गोपाल भी है कृष्ण वाला रूप में अर्जुन को समझा भी रहे और साथ भी है। बेटा का संस्कार है की अभी तक अपने पिता से काफी नरमी और मुलायम से पेस आ रहा है। लेकिन अपने पिताजी के अमर प्रेम से थोड़ा शर्मिदगी महसूस कर रहा है। दुनिया के लांछन से डरकर पिताजी को समझने की कोशिस में है लेकिन बाबूजी है की मान नहीं रहे। अब काका का सब्र जवाब दें रहा था कुछ -कुछ त्योरी चढ़ा कर बोले -अरे तू यही बकवास कर रहा है हम अखबार का समाचार पूछ रहे और तू है की किसी के घर के बंदरवाट का कहानी सुना रहा है। यहाँ तो रोजे किसी के घर में ई सब झगड़ा चलते रहता है। तू कोनो नहीं जानता है क्या। 
मनसुख -काका तू बेकार में खौजियाते रहते हो अब यही समाचार लिखा है तो का बताये। अब तोहे पढ़ना आता है तो पढ़ लो।काका तो ठहरे कला अक्षर भैस बराबर ,बोले अच्छा आगे बता। 
मनसुख -तो काका ओहि तो बता रहे। अखबार कहता है की झगड़ा का कारण का है ई तो पता नहीं। लेकिन सब सुलह में लगे है ,लेकिन दिक्कत है की यहाँ कृष्ण तो साथ है लेकिन अभी तक अर्जुन को गीता ज्ञान नहीं दिए। अभी तो बस सुलह का दौर चल रहा है। अब देखे इस नौटंकी में कब अर्जुन  सामने हाथ में गांडीव धारण कब युद्ध के  ललकार दे। ई काका ग्रेट महाभारत शो चल रहा है, वैसे भी भगवान् तो कह ही गए है कि ई यदु वंश तो आपसे में लड़ कट मिटेगा। अब देख तो सब रहा है लेकिन समझाता काहे नहीं ई नहीं समझ में आता है। जनता भी आनंदित होकर इस नौटंकी को देख मजे लेने में लगी है। ई भी जरुरी है न जब परिवार नहीं तो गांव कैसा और गांव न तो शहर कैसा और शहर न तो प्रदेश  कैसा। इसलये सब मिलकर पहले परिवार बचाने में लगे है ताकि प्रदेश बचे। कुछ दिन राज काज रुकिए जाएगा तो कोनो सुनामी थोड़े ही आ जायेगा। सो सबकुछ छोड़छाड़ कर अब इसको सब सुलझाने में लगे है। वैसे भी यहाँ तो सब भगवान् भरोसे ही चलता है। 
  किन्तु काका के दिमाग में अब भी कुछ नहीं पल्ले परा और वो बैल को चारा देकर अपने दूसरे काम के लिए चल दिए। जबकि मनसुख उस अख़बार में कोई और कहानी तलाश रहा था।  

आदिपुरुष...!!

 मैं इसके इंतजार में था की फ़िल्म रिलीन हो और देखे। सप्ताहांत में मौका भी था। सामान्यतः फ़िल्म की समीक्षा फ़िल्म देखने से पहले न देखता हूँ और न...